नई दिल्ली: श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने ‘वाइ. टी. ए.’ योग तंत्र एवं आगम संस्था के सहयोग से तंत्रागम पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी में देशभर से आए प्रतिष्ठित विद्वानों, शोधकर्ताओं एवं साधकों ने भाग लेकर इस प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के दार्शनिक एवं व्यावहारिक आयामों पर गहन विचार-विमर्श किया।
उद्घाटन सत्र में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं पद्मश्री से सम्मानित प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने तंत्रागम साहित्य की बौद्धिक गहराई और सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह भारतीय दार्शनिक परंपरा की अमूल्य धरोहर है तथा समकालीन शैक्षणिक विमर्श में इसकी प्रासंगिकता निरंतर बढ़ रही है। उन्होंने अपने दीर्घकालीन अध्ययन और शोध अनुभव साझा करते हुए बताया कि तंत्रागम साहित्य मानव मन की गहन समझ तथा प्राचीन ऋषियों के अनुभवजन्य ज्ञान को उजागर करता है। वैखानस एवं पाञ्चरात्र आगम परंपराओं तथा रुद्रयामल तंत्र जैसे ग्रंथों का उल्लेख करते हुए उन्होंने इनके वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक आयामों को रेखांकित किया, जो साधक को सजगता और परम ऊर्जा की प्राप्ति की दिशा में मार्गदर्शन देते हैं। उन्होंने ‘स्वाध्याय’ को भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल आधार बताया।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वैदिक विज्ञान मानव को भौतिक जगत् से परे जाकर आंतरिक चेतना के माध्यम से सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, जिससे शांति, संतोष एवं समस्त प्राणियों के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है और विश्व में समरसता का वातावरण निर्मित होता है। उन्होंने ‘आगम’ और ‘निगम’ की अवधारणाओं की व्याख्या करते हुए बताया कि ये परस्पर संबंधित तत्व प्राचीन ज्ञान के सार को समझने में सहायक हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ‘वाइ. टी. ए.’ योग तंत्र एवं आगम संस्था के प्रमुख स्वामी परमानंद तीर्थ ने तंत्रागम परंपराओं की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह परंपरा आध्यात्मिक ज्ञान को आधुनिक जीवन के साथ संतुलित करते हुए आंतरिक रूपांतरण का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत साहित्य का विशाल भंडार मानव शरीर एवं मन के सूक्ष्म आयामों को समझने में सहायक है तथा अनुशासित ध्यान साधना के माध्यम से चेतना के उच्च स्तर को प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कई तंत्रागम के संस्कृत-ग्रंथों के व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।
विश्वविद्यालय के व्याकरण विभाग के आचार्य प्रो. रामसलाही द्विवेदी ने बताया कि इस प्रकार के आयोजन पूर्व में भी किए गए हैं, जिन्हें विद्वानों एवं प्रतिभागियों से व्यापक सराहना मिली है। उन्होंने कहा कि तंत्रागम ग्रंथों में शरीर एवं मन की शुद्धि का प्राचीन विज्ञान निहित है, जो भारत की अमूल्य बौद्धिक एवं आध्यात्मिक धरोहर है। उन्होंने यह भी बताया कि तंत्रागम परंपरा विभिन्न ग्रंथों में शिव एवं शक्ति के दिव्य संवाद के रूप में प्रतिपादित होती है, जिन्हें मुख्यतः शैव एवं वैष्णव तंत्र ग्रंथों में वर्गीकृत किया गया है। उनके अनुसार, एक साधक को इन ग्रंथों का गहन अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि ये मानव चेतना को ऊँचा उठाने और भौतिक आसक्तियों से परे ले जाने की क्षमता रखते हैं।
विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विद्वानों ने कुलार्णव तंत्र, विज्ञान भैरव तंत्र, योगिनीहृदय तंत्र, प्रपंचसार तंत्र, शारदातिलक तंत्र, सौन्दर्यलहरी, अहिर्बुध्न्य संहिता, अभिनवगुप्त कृत तंत्रालोक, यामल तंत्रों सहित अनेक पवित्र ग्रंथों के महत्त्व पर प्रकाश डाला, जिन्होंने संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया है।
शोध-पत्र प्रस्तुत करने वाले प्रमुख विद्वानों में प्रो. कमला भारद्वाज, प्रो. जयकांत सिंह शर्मा, प्रो. दिवाकरदत्त शर्मा, प्रो. दयाल सिंह, प्रो. सुजाता त्रिपाठी, प्रो. ए. एस. अरवामुदन, प्रो. के. अनंथा, प्रो. देवेंद्र मिश्र, डॉ. अशोक कुमार, डॉ. अर्चना कुमारी, डॉ. आरती शर्मा, डॉ. प्रवेश व्यास (श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय); प्रो. के. सतीश (राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय); प्रो. उमाशंकर त्रिपाठी (राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, महोबा); प्रो. प्रमोद कुमार शर्मा (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय); डॉ. गीतिका काव खेर (एमिटी विश्वविद्यालय); डॉ. सुनील जोशी (हिंदू कॉलेज) तथा डॉ. अशोक सेमवाल (श्री भगवान दास आदर्श संस्कृत कॉलेज, हरिद्वार) शामिल रहे।
संगोष्ठी में 80 से अधिक स्नातक, स्नातकोत्तर एवं पीएच.डी. शोधार्थियों ने तंत्रागम के विभिन्न आयामों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए, जो इस क्षेत्र में बढ़ती शैक्षणिक रुचि को दर्शाता है।
समापन सत्र में स्वामी परमानंद तीर्थ एवं प्रो. मुरली मनोहर पाठक द्वारा प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। ‘वाइ. टी. ए.’ योग तंत्र एवं आगम संस्था के स्वयंसेवकों ने संगठन का वार्षिक समाचार-पत्र भी वितरित किया।

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