मेघना गुलज़ार की फिल्म ‘दायरा’ सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं, बल्कि हमारे समय के सबसे जटिल सवालों को सामने रखने वाली एक बेहद संवेदनशील और विचारोत्तेजक फिल्म है। इस फिल्म का स्पेशल प्रिव्यू देखने के बाद यह साफ हो जाता है कि यह कहानी किसी एक अपराध की नहीं, बल्कि उस अपराध के बाद समाज और सिस्टम के भीतर उठने वाले तूफान की है।
फिल्म की कहानी एक जघन्य अपराध से शुरू होती है, जो दर्शकों को तुरंत भावनात्मक रूप से झकझोर देती है। लेकिन दायरा यहां रुकती नहीं—यह उस दर्द, गुस्से और बेचैनी के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा करती है: क्या त्वरित न्याय ही असली इंसाफ है? और कानून की सीमा आखिर कहां तक है?
फिल्म देखते हुए हैदराबाद के चर्चित गैंगरेप और एनकाउंटर केस की याद बार-बार आती है। हालांकि मेघना गुलज़ार ने इसे सीधे तौर पर किसी वास्तविक घटना पर आधारित नहीं बताया है, लेकिन उस घटना की छाया फिल्म पर स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यही वजह है कि फिल्म और भी प्रासंगिक और असरदार बन जाती है।
निर्देशन की बात करें तो मेघना गुलज़ार यहां पूरी तरह अपने फॉर्म में नजर आती हैं। वह दर्शकों को कोई आसान जवाब नहीं देतीं, बल्कि उन्हें एक असहज स्थिति में खड़ा कर देती हैं, जहां भावनाएं और कानून आमने-सामने आ जाते हैं। दायरा कोर्टरूम ड्रामा से ज्यादा एक इन्वेस्टिगेशन और नैतिक संघर्ष की कहानी है, जहां हर परत खुलने के साथ सवाल और गहरे होते जाते हैं।
करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन दोनों ही अपने किरदारों में बेहतरीन नजर आते हैं। करीना एक सख्त लेकिन संवेदनशील अधिकारी के रूप में प्रभाव छोड़ती हैं, वहीं पृथ्वीराज का दृढ़ और तीखा किरदार फिल्म को मजबूती देता है। दोनों के बीच का वैचारिक टकराव फिल्म की जान है, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी ईमानदारी है। यह न तो अपराध की भयावहता को कम करती है और न ही भीड़ के गुस्से को पूरी तरह सही ठहराती है। इसके बजाय यह दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि अगर कानून पर भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तो क्या हम न्याय के नाम पर उसी कानून को तोड़ सकते हैं?
निष्कर्ष:
दायरा एक ऐसी फिल्म है जो मनोरंजन से ज्यादा आपको सोचने के लिए मजबूर करती है। इसका असर फिल्म खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आपके साथ बना रहता है। मेघना गुलज़ार ने एक बार फिर साबित किया है कि सिनेमा सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि समाज का आईना भी हो सकता है।

और भी हैं
मैजिकम में बर्लिन की जादू की छिपी हुई दुनिया को जानें
‘है जवानी तो इश्क होना है’ (रिव्यू): वरुण धवन की कॉमेडी से भरपूर फिल्म, खूब सारी उथल-पुथल, कन्फ्यूजन और डेविड धवन का क्लासिक एंटरटेनमेंट
संत का किरदार निभाना आसान नहीं, मुझ पर महाराज जी का आशीर्वाद: अभिनेता सुबोध भावे